ठक् और ठन् प्रत्ययों का अन्तर

प्रश्न था कि

क्रमिक, क्षणिक, पथिक, श्रमिक, भ्रमित व वर्णिक शब्दों में इक प्रत्यय लगा हुआ है फिर इन शब्दों में प्रथम स्वर दीर्घ क्यों नहीं हुआ? जबकि इनमें मूल शब्द है इक प्रत्यय जिस शब्द में लगता है उसका प्रथम स्वर दीर्घ हो जाता है उदाहरण समाज से सामाजिक आदि है।

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इन सभी शब्दों को संस्कृत से यथावत तत्सम रूप में लिया गया है। इनमें भ्रमित शब्द में -इक प्रत्यय लगा मानकर आप स्वयं भ्रमित हो गए हैं।

संस्कृत भाषा के ठक् प्रत्यय लगाकर जो शब्द रचे जाते हैं उनमें प्रथम स्वर मात्रा दीर्घ हो जाती है। किन्तु जो ठन् प्रत्यय लगाकर रचे जाते हैं उनकी प्रथम स्वर मात्रा दीर्घ नहीं की जाती है।

ठक् प्रत्यय के उदाहरण :—

प्रथम + ठक् → प्राथमिक (जो प्रथम हो)

शब्द + ठक् → शाब्दिक (जो शब्द का उत्पाद हो; शब्दों की व्याख्या तथा व्याकरण करने वाला व्यक्ति)

वर्ष + ठक् → वार्षिक (जो प्रतिवर्ष एक बार हो)

तर्क + ठक् → तार्किक (जो तर्क का उत्पाद हो; तर्कसंगत व्यक्ति)

कर्म + ठक् → कार्मिक (जो कर्म का उत्पाद हो; कर्मरत व्यक्ति)

समाज + ठक् → सामाजिक (जो समाज का हो; समाज में रहने वाले प्राणी)

सुवर्ण + ठक् → सौवर्णिक (जो सोने के वर्ण का हो)

विशेष —

ठक् प्रत्यय के समान ही मात्रा की वृद्धि वाला एक अन्य प्रत्यय ठञ् भी है। यदि कोई वस्तु किसी से हो; इस अर्थ में ठञ् प्रत्यय प्रयोग किया जाता है। यथा,

वर्ण + ठञ् → वार्णिक (वर्णों को लिखने वाला, जिसका अस्तित्व वर्णों से है; अर्थात लेखक)

गोपुच्छ + ठञ् → गौपुच्छिक (जो गाय की पूँछ के सहारे तैरता हो)

सुवर्ण + ठञ् → सौवर्णिक (जिसका व्यवसाय स्वर्ण से चलता हो, सुनार)

ठन् प्रत्यय के उदाहरण :—

क्रम + ठन् → क्रमिक (जो क्रमबद्ध है)

क्षण + ठन् = क्षणिक (जो क्षण मात्र है)

पथ + ठन् → पथिक (जो पथ पर है)

श्रम + ठन् → श्रमिक (जो श्रम करता है)

जिन शब्दों की रचना में मूल शब्द को ठन् प्रत्यय लगा कर की गई है वे उन मूल शब्दों के भाव के बन्धन में हैं। इस प्रकार के शब्दों की रचना में प्रथम मात्रा दीर्घ नहीं की जाती है।

जहाँ शब्दों की रचना में मूल शब्द को ठक् प्रत्यय लगा कर की गई है वे उन मूल शब्दों के भाव के उत्पाद, लक्ष्य, अथवा परिणाम हैं। इस प्रकार के शब्दों की रचना में प्रथम मात्रा दीर्घ कर दी जाती है।

पथिक को पथ दिखाने वाले को पाथिक कहते हैं (पथ + ठक्)।

कुछ उदाहरणों से इनका भेद समझने का प्रयास करते हैं; जिनमें मूल धातु शब्द को ठक् तथा ठन् दोनों ही प्रकार के प्रत्यय लगाकर रचे शब्द मिलते हैं।

नल + ठन् + टाप् → नलिका (नली, जो किसी को बाँध कर रखे; यथा पानी के प्रवाह को बाँधना)

नल + ठक् + टाप् → नालिका (नाली, जो स्वतः ही बन्धन में हो; यथा मूलतः नाली प्राकृतिक रूप से बना बन्धन है; जो पानी के सीमाबद्ध बहने से हुए कटाव का परिणाम है)।

पुत्र + ठन् → पुत्रिक (पुत्र वाला होना)

पुत्र + ठक् → पौत्रिक (पुत्र के स्वामित्व का होना, पुत्र है इस कारण है)

ठन् प्रत्यय गुणवाचक सञ्ज्ञा अथवा विशेषण की रचना करते हैं; इनमें प्रथम मात्रा दीर्घ नहीं होती। ठक् प्रत्यय किसी गुण विशेष के परिणाम को दर्शाने वाले भाववाचक शब्द हैं। इनमें प्रथम मात्रा दीर्घ की जाती है। यह दोनों निकटवर्ती अर्थों में प्रयोग होते हैं।


ठन् प्रत्यय का प्रयोग अनेक भारोपीय भाषाओं में किया जाता है। यथा,

अंग्रेजी class (अच्छी श्रेणी/वर्ग) से classic (अच्छी श्रेणी/वर्ग वाला)

इस प्रत्यय के समरूप ग्रीक -ικός (-इकोस्; उदाहरण From εἰκών (एइइकोन, “icon”) +‎ -ῐκός (-इकोस -ic) → εἰκονικός (एइकोनिकोस, , “iconic”), पुरानी अंग्रेजी -ig (-इग् आधुनिक अंग्रेजी भाषा में यह -y (-ई) हो गया है यथा wind से windy), लैटिन -icus (इकस् — जिससे अंग्रेजी -ic बना है; उदाहरण ūnus (ऊनुस — एक) + ‎-icus (इकस)→ ‎ūnicus (ऊनीकुस → अंग्रेजी unique; संस्कृत : एकिक); पुरानी चर्च स्लावोनी -ъкъ (-उकु) आदि हैं।

डच भाषा पुरानी अंग्रेजी से कुछ साम्यता रखती है; एक उदाहरण डच से :—

stijf (स्ताइफ़ — सख्त) +‎ -ig (-इग्) = stevig (स्तेफिग — जो सख्त हो)


© अरविन्द व्यास, सर्वाधिकार सुरक्षित।

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लगता है कि यह लेख अधूरा रह गया है।

जी अभी देखकर सुधार कर दिया गया है।

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